“ओबरा-बिल्ली खदान में तबाही! मलबे में 15 मजदूरों के दबे होने की आशंका, शासन की घेराबंदी से बढ़ी सच्चाई छुपाने की शंका!”

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आज भी राहत–बचाव जारी, मलबे में 12–15 मजदूरों के दबे होने की आशंका
प्रशासन की घेराबंदी से बढ़ी रहस्य की परत, क्या छिपाया जा रहा है बड़ा सच?**

सोनभद्र। ओबरा थाना क्षेत्र अंतर्गत बिल्ली खनन इलाके में शुक्रवार को हुए भीषण हादसे ने पूरे जनपद को झकझोर कर रख दिया है। घटना के 24 घंटे बीतने के बाद भी मलबे में 12 से 15 मजदूरों के दबे होने की गंभीर आशंका जताई जा रही है।

सुबह से ही प्रशासनिक अमला खनन क्षेत्र में पूरी मुस्तैदी के साथ मौजूद रहा। स्थान पर भारी पुलिस बल की तैनाती, बैरिकेडिंग और पत्रकारों को खदान के अंदर जाने से रोकना—यह सब मिलकर हादसे की गंभीरता पर कई सवाल खड़े कर रहा है।

🔴 पत्रकारों को भीतर जाने से रोकना… क्या है इसके पीछे की वजह?

स्थानीय पत्रकारों के अनुसार, प्रशासन ने पूरे खनन क्षेत्र को सीलनुमा घेराबंदी में बदल दिया है, जिससे यह कयास तेज हो गए हैं कि या तो हादसा बहुत बड़ा है या फिर त्वरित कार्रवाई में अधिकारियों द्वारा किसी तरह की जानकारी को दबाने की कोशिश की जा रही है।

सोशल मीडिया पर खुलासों को रोकने के लिए प्रशासन द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों ने जनमानस के मन में “कुछ बड़ा छिपाया जा रहा है” जैसी शंकाएँ और गहरा दी हैं।

🔴 मलबे से मिला एक शव — सिर पूरी तरह लापता

सबसे चौंकाने वाली जानकारी यह है कि राहत–बचाव टीमों ने अब तक एक मजदूर का शव बरामद किया है, जिसका सिर गायब था। शव की स्थिति देखकर अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि पत्थर और भारी मलबे के दबाव ने उसकी पहचान तक मुश्किल बना दी है।

मौके पर मौजूद कुछ लोगों का दावा है कि मलबे के नीचे अभी भी कई मजदूर फंसे हो सकते हैं, और उनकी तलाश युद्धस्तर पर जारी है।

🔴 खदान बंद थी, फिर कैसे हो गया हादसा?

‘भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती’ पर जिलेभर में खनन कार्य बंद रखने के आदेश थे। इसके बावजूद ओबरा–बिल्ली खनन क्षेत्र में खदान के चालू रहने और माइनिंग चलने के आरोप ने जिम्मेदार अधिकारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यहाँ लंबे समय से चोरी–छिपे खनन चलता रहा है, जिसकी सूचना कई बार दी गई, लेकिन कार्रवाई केवल कागज़ों में ही सीमित रही।

🔴 प्रशासन सर्च ऑपरेशन में जुटा, लेकिन चुप्पी बहुत कुछ कहती है

एनडीआरएफ–एसडीआरएफ जैसे विशेषज्ञ बलों के बजाय स्थानीय प्रशासन अपने स्तर पर ही बचाव कार्य करवा रहा है, जबकि हादसे की भयावहता को देखते हुए उच्च स्तरीय टीमों की जरूरत है।

अधिकारी लगातार मीडिया से दूरी बनाए हुए हैं।
ना आधिकारिक प्रेस नोट जारी हुआ, ना मौतों का स्पष्ट आँकड़ा, जिससे शंकाएँ और गहरी होती जा रही हैं।

🔴 परिजनों का रो–रोकर बुरा हाल, प्रशासन पर सवालों की बौछार

खनन क्षेत्र के बाहर जमा परिजन प्रशासन से बार–बार गुहार कर रहे हैं कि मलबा हटाने की गति तेज की जाए मजदूरों की सही संख्या बताई जाए और घटना की पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक की जाए लेकिन प्रशासन की चुप्पी परिजन और स्थानीय जनता दोनों को असहज कर रही है।

🔴 बड़ा सवाल: क्या हादसे की गंभीरता को दबाया जा रहा है?

सवाल अभी भी हवा में तैर रहा है—
क्या प्रशासन मजदूरों की मौत के वास्तविक आंकड़ों को छिपाने की कोशिश कर रहा है?
क्या खनन माफिया और अधिकारियों की मिलीभगत का बड़ा मामला सामने आने वाला है?
या फिर यह चुप्पी किसी बड़े खुलासे का संकेत है?

🔴 फिलहाल राहत–बचाव जारी, लेकिन सच कब सामने आएगा?

जैसे–जैसे समय बीत रहा है, मलबे के नीचे फंसे मजदूरों के लिए उम्मीदें धुंधली होती जा रही हैं।
स्थानीय लोग और पीड़ित परिवार प्रशासन से केवल एक ही मांग कर रहे हैं—“सच सामने लाया जाए, जिम्मेदारों पर कार्रवाई हो और पीड़ितों को न्याय मिले।

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